इस बार कोई तस्वीर भी नहीं खींचीं

कहते हैं, जब वक़्त गहराता है, तब बात कुछ और होती है. दोस्ती में कब हम इस कदर दोस्त बन जाएँ कि दिल्ली आने पर एक बार भी वक़्त न निकाल पायें, तब इसे कैसे समझना चाहिए यही सोच रहा हूँ? सोच रहा हूँ और अभी भी इसी प्रक्रिया में लगा हुआ हूँ इसीलिए राकेश के बुधवार वापस छिंदवाड़ा चले जाने के तीन दिन बाद कह रहा हूँ. पता नहीं इस बार को किस तरह लिखना चाहिए? यह संबंधों में शायद शिथिलता है या कुछ और? वैसे इसे समझने के लिए कुछ ख़ास औजारों की ज़रूरत नहीं है.

हम जान जाते हैं कि दिल्ली की दुपहरों का बढ़ता तापमान हमारे मिलने जुलने में एक वायवीय दूरी का सृजन करता है लेकिन मानसिक दूरी नहीं है, ऐसा दिखाने के प्रयास भी साथ-साथ होते रहते हैं.

इस बार यही कोशिशें नहीं हुईं. सिर्फ़ अपनी तस्वीर की जगह काले धब्बे लगाकर कुछ दुःख के सागर की अथाह गहराईयों को नापते हुए वास्को डिगामा हो गए, किन्हीं को दक्षिणपंथी होने से कोई परहेज़ नहीं रहा. यह सीधे-सीधे उन तमाम तरह के आरोपों की स्थापना करने जैसा है. ऐसा बहुत पहले कर लिया जाना चाहिए था. वह अपने खोल में इस कदर सिमट गया है कि उसे पता भी नहीं चल रहा कि बाहर की दुनिया उसके लिए इंतज़ार करके या तो जा चुकी है या बदल चुकी है. जो रुके हुए हैं, वह आले दर्ज़े के बेवकूफ हैं. जैसे तुम.जैसे सब.

मैं इस तरह इसलिए भी लिख रहा हूँ कि जिनकी पहचानें अभी तक उघडी नहीं हैं, वह बची रहें. एक को फ़ोन किया तो उसने इतना भी नहीं कहा कि दरियागंज पास ही है, तुम लोग किताबें देख लेना तो यहाँ आ जाना. उसका वक़्त कीमती है. उसने पहले बता दिया था. इसलिए हमने सीधे माल रोड की तरफ़ जाती नौ सौ एक नंबर पकड़ी और पटेल चेस्ट आ गए. किताब यहाँ भी नहीं मिली पर एक दोस्त मिला. बहुत सालों बात. राकेश को कहने लगा बरेली में किसी ने कैसे पिछले चार साल में कोचिंग सेंटर का बाज़ार बिठा लिया है, तुम भी रीवा में क्यों नहीं शुरू कर लेते? बात पैसे पर नहीं आई पर बात अटक गयी. बात अटक गयी सरकारी नौकरी को उन फोटोस्टेट के नोट्स के बलबूते पास करने की योजना को लेकर. दिसम्बर में गवालियर आऊँगा, तुम भी आ जाना. और नौकरी ले लेना.

चलो जाने देते हैं, फ़ालतू बात है. पर हम इस बार चाँदनी चौक को घूमते हुए नहीं मिले. उन गलियों को उन हिस्सों को हमने इसबार नहीं छुआ. पता नहीं आगे अब शायद ही मौका आये. जब सब अपने अपने दायरों में घुसे बैठे हैं और उन बहानों को पहले ही दूसरों पर लाद चुके हैं, तब कुछ नहीं हो सकता. हम बस उन बहानों के फ़ेर में पड़कर घूमते रहेंगे. और हमने इस बार कोई तस्वीर भी नहीं खींचीं. बस दो सेल्फी हैं. इस वाली के अलावे.

टिप्पणियाँ

इस ब्लॉग से लोकप्रिय पोस्ट

बेतरतीब

आबू रोड, 2007

हंस में आना

शहतूत आ गए हैं: मेरी पहली किताब

हिंदी छापेखाने की दुनिया

जगह

वापसी