गाँव: अधूरे दिन

दिन वही

हम यहाँ हैं. चाचा चाची के यहाँ. रात पौने एक बजे कैसरबाग़ से चली बस सुबह चार बजे बहराइच पहुँच गयी. रोड़वेज़ से मल्हीपुर बसस्टैंड के ढाई सौ रुपये. जितने में ढाई लोग एक सौ बीस किलोमीटर का सफ़र करके इस स्टैंड पर सुबह-सुबह खड़े हो सकते हैं, उतने में चार किलोमीटर का डीज़ल फूँकने जा रहा हो जैसे.

यहाँ सुबह से सोते रहे. रात जगने के बाद सोने का ही काम बचा रह गया था. यहीं लोहे की टीन के नीचे तख़्त पर लेट गए. पता नहीं कहाँ से बाहर निकलने का मन नहीं हुआ. मन न होने के कई कारण हो सकते हैं. जैसे गरमी बहुत रही होगी. अभी सोने का मन रहा होगा. खाना खाकर वैसे भी सोने से बड़ा कोई काम नहीं बचता. आराम कर लेते हैं तब निकलेंगे शाम को. कुल मिलाकर यही दिख रहा है.

मन में वही बात घूमती रही. जहाँ से हमने सबको छोड़ा था वहीँ से सब शुरू होता तो कितना अच्छा होता. मैं इस बात को हर बार याद किया करूँगा. पता नहीं क्यों. दो साल बाद जब हम यहाँ आये हैं तब न सुरेस के दादा, हमारे बाबा हैं न गुड्डू की अम्मा, हमारी दादी हैं. दोनों चले गए. दादी उसी साल जब हम आये थे. बाबा तब जब हम नहीं आये थे. इन दोनों से फ़िर कभी न मिल पाने वाला भाव वहीँ ट्रेन के डिब्बे में अन्दर घर कर रहा था. आहिस्ते-आहिस्ते. सोचता रहा जब बाहर निकलेंगे, तब यह दोनों बाबा दादी नहीं होंगे. जहाँ हम इन्हें छोड़ कर गए थे वहाँ दोनों ही नहीं होंगे.

शाम जब निकले तब बाबा की आँखों में दादी की रिक्तता कहीं किसी कोने में रखी हुई दिख गयी. उदास से. अकेले से. जो एक गुम हो जाने का दर्द होता है. पीड़ा चेहरे से दिल में धँसती चली जाती है जैसे. सुरेस को हो नहीं सकता कि हमारे आने की ख़बर नहीं हो. पर अभी सवा तीन बजे तक वह दिखा नहीं है. कोई बात होगी, उसके चेहरे पर भी. देखना चाहता हूँ, क्या होगा वहाँ? कोई खालीपन. कोई उदासी. जब बाबा थे, तब वह दो थे. बाबा और सुरेस. अब जबकि बाबा नहीं हैं, तब चाची हैं. हैं अभी भी दो. पता नहीं किन दोनों में हम सबसे जादा रह गए होंगे. मिलेंगे तब देखेंगे. देख भी पायेंगे या बस कह ही दे रहे हैं? देखते हैं.

पता नहीं लिखने का मन नहीं है पर अभी दिमाग में बुआ और फूफा का वह किराए का कमरा घूम गया. अभी नहीं. सारी ज़िन्दगी जमनहा के बाहर बिता दी. इस जैसे कई कमरों में. यह कहानी दिमाग से लिखी जायेगी तब जाकर अन्दर दाखिल होगी. अभी आँखें भारी हो रही हैं. लेटना है.

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