दिल्ली से लखनऊ, गोमती एक्सप्रेस

कहाँ से लिखना शुरू करूँ? जब से ट्रेन में बैठे हैं तब से या बिलकुल उस बिंदु से जब हम बड़े-बड़े झोलों के साथ प्लेटफ़ॉर्म पर अपने कन्धों के साथ जूझ रहे थे। भीड़ हमारी ही तरह नहीं होती। हम इत्मीनान से थे। वह बेसबर थे। हमारा टिकट चेयरकार में था। गरमी का क्या, वहाँ इंसानों का भी आना मना था। हवा भी वहाँ आ जा नहीं पा रही थी। घुटन तो नहीं पर अगर सिर के ऊपर का पंखा भी न चले, तब ऐसा एहसास होना, कोई बड़ी बात नहीं।

अन्दर सब अपनी अपनी सीटों पर बैठे हैं। कोई किसी सीमा का अतिक्रमण नहीं कर रहा है। कम से कम यहाँ बैठे सब लोग अपने साथ दो का संग आपस में लाये होंगे, तब इस दस घंटे के लिए तय्यार हुए होंगे। यह ‘दूसरा’ किसी के लिए दोस्त, भाई-बहन, बीवी, मोबाइल, किताब या फ़िर थक हारकर अँधेरा न होने तक खिड़की तो ज़रूर होगी।

एक लड़की के पैरों में अभी भी मेहँदी लगी हुई थी। नयी-नयी शादी हुई होगी। हफ़्ते से भी कम वक़्त हुआ होगा। कुली के इंतज़ार में उसके नए नवेले पति ने एक झोला भी नहीं उठाने दिया उसे। सुकवार हैं या यह सब लोग इंसान ही नहीं हैं, कभी-कभी समझ नहीं पाता। पास ही एक सफ़ेद चिकनकारी वाले कुरते में चाचा से भी बड़ी उमर के शख्स थे। जिनसे डिब्बे के अन्दर हमने कहा थोड़ा आप वहाँ बैठ जायेंगे तो हम तीनों भाई बहन एक साथ हो जाते। अकेले थे। थोड़े इंसान भी रहे होंगे, इत्मीनान से कहा और मान गए। दो बहने थीं। चार्ट में उनके नाम मुसलमान ज़रूर थे पर पता नहीं सलवार कुरते में उनके पास ऐसा कोई चिन्ह नहीं था। जब तक बोले नहीं तब तक पकड़ना मुश्किल है। अलीगढ़ में एक दो बच्चों के साथ सफ़र कर रही महिला को कहा गाड़ी चल पड़ी है। उनके बाद मैं भागते हुए चिप्स लेकर अन्दर दाखिल हुआ। गाड़ी को सब बड़े करीने से इस्तेमाल कर रहे थे। चार्जर पॉइंट पर एक लड़का अपना लैपटॉप लगाकर कान में लीड ठूँसे कोई अंग्रेज़ी पिक्चर देख रहा था।

हमारे अलावे उस कम्पार्टमेंट सी-1 में दो-तीन लोग ही किताबों के साथ देखे पाए गए। एक लड़की थी, जो अपनी किताबें सामने रख कर ढो रही थी। उसके अपने बैग में इन गैर-ज़रूरी चीज़ों के लिए जगह नहीं बन पायी थी। एक अधेड़ उम्र के पुरुष के पास, जो संभवतः इटावा के आस पास चढ़े, उनकी गोद में शालीन न कहे जाने वाले स्त्री रेखाचित्रों वाली कहानियों की एक पतली-सी पत्रिका थी। अलीगढ से जो युवक अन्दर आये, वह अपनी सीट पर धँसने के बाद 'कैम्ब्रिज इंग्लिश ग्रामर' निकाल कर पढ़ने लगे। इसी के आसपास एक और प्रौढ़ उम्र के व्यक्ति के पार 'इंडिया टुडे' दिखी। हिंदी में। समाचार पत्रिका। उसे पढ़ लेने के बाद उन पन्नों से किसी भी तरह का कोई लगाव नहीं दिखा। वह पत्रिका को ऐसे ही अपने सहयात्री के रहमो करम पर छोड़ कर इधर से उधर घूम रहे थे।

हम थे, प्योर साहित्यिक। घर से निकलने के अंतिम क्षणों में बैगों का वजन देखकर पहली बात जो मन में आई, वह यह कि ऐसी किताबें ले चलते हैं, जो बेवजह वजन और न बढ़ाएं। तब जो रह गयीं उनमें दुष्यंत की औसत (ट्रेन में पढ़कर यह कहा जा रहा है) किताब, जिससे अच्छे तो किसी ज़माने के मेरे ख़ुद के ब्लॉग पोस्ट हैं। इस‘जुलाई की एक रात’ के साथ निधीश त्यागी की ‘तमन्ना तुम अब कहाँ हो?’ और चन्दन पांडे की ‘इश्क़फ़रेब’ रख ली। पता नहीं यह कैसे हुआ(?)कि रणेंद्र की ‘गायब होता देश’ को घर छोड़ आया, वह भी इन तीनों के साथ पेंगुइन से ही प्रकाशित है।

बहरहाल। वापस पटरी पर। रास्ते भर एक कम उमर का मामा अपने कम उमर के भांजों के लिए वाईफाई के हॉटस्पॉट को बंद चालू करता रहा। उन पाँचवी-छठी में पढ़ने वाले दोनों भाईयों के लिए रेल का सफ़र इस कदर उबाऊ लग रहा था कि यह तकनीक उनके वक़्त में सेंध लगा पायी। सीट के पीछे बैठे लड़का-लड़की जोकि पति-पत्नी भी थे, उनके पास भी बात करने को कुछ ख़ास नहीं था या यह हो सकता है, उनकी बातें इतनी निजी हों कि एक सार्वजनिक स्थल पर करने लायक न हों इसलिए दोनों मोबाइल पर किसी विडियो को देख रहे थे और उसपर बात हो रही थी।

हमने दो बार खाना खाया। दोनों बार घर का बना हुआ। परवर की सब्जी और पूड़ी। एकबार दोपहर तीन बजे और दूसरी बार कानपुर से निकल जाने के बाद लगभग सवा आठ बजे। एक महाशय जो कानपुर से ही चढ़े थे वह हमारे खाने को लेकर बड़ी उत्साही जान पड़े और बार-बार बहाने से पीछे मुड़ते और उस टिफ़िन को बड़े गौर से देखते जिसमें परवर की सब्जी रखी हुई थी।

(बारह मई, साढ़े तीन बजे। चाचा के यहाँ)

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