गाँव निकलने से थोड़ी पहले..

दिन बीतते जाते हैं और एक दिन आता है, जब हम यहाँ से चल पड़ते हैं। यह देखते-देखते इतनी तेज़ी से इतनी पास आ पहुँचते हैं। कि लगता है हमसे टकरा जायेंगे। हम भी बचना नहीं चाहते। फ़िर ऐसा लगता है तुम इतनी जल्दी क्यों आ गए? यह प्रक्रिया सामान रूप से दोनों तरफ़ से होती है। एक बार यहाँ से चलते वक़्त, दूसरी बार वहाँ से आते हुए। दोनों ही बारियों में उस वर्तमान जगह से कहीं जाने का मन नहीं करता। अनमना हो जाना ऐसा ही है। या शायद यह दोनों जगहों से ऐसी जगह पहुँच जाने का न दिखने वाला अनिश्चय भाव होता होगा, जहाँ हम ख़ुद को देख नहीं पा रहे होते हैं। 

भले हम कितने ही कल्पनाजीवी हों, नहीं बता सकते उन आने वाले दिनों में हम वहाँ क्या करने वाले हैं। एक तो यहाँ की बनी बनाई अव्यवस्थित दिनचर्या से ऊब और भाग लेने के निश्चय भी होते रहते हैं लेकिन जब ऐसा करने का समय आता है, तब हम धीरे-धीरे पीछे हट जाना चाहते हैं। पर यह भाव हमारे अन्दर बहुत थोड़ी देर के लिए होता है। हम इसे अपने ऊपर हावी नहीं होने देते। हम जाने की तययारी मन मार कर नहीं करते। पर पता नहीं यह कैसा भाव उस ख़ास चलने वाले दिन ख़ुद पर तारी होने लगता है? फ़िर तो मन करता है, जल्दी से स्टेशन पहुँच जाएँ और रेल चल पड़े। वह सिर्फ़ चल ही न पड़े बल्कि सीधे मुहारे तक छोड़ भी आये। क्योंकि हम सभी उन जगहों से आते हैं, जहाँ हमारे पूर्वजों के पास इतनी पूंजी नहीं थी कि प्लेटफ़ॉर्म पर कूदे नहीं कि घर दिखने लग जाये। एक अदद ऐसी गली मोहल्ले हम सबकी यादों में कुछ अपने से हैं, जहाँ से हम आते हैं।

बचपन से इन लम्बी गर्मियों की छुट्टी और टिकट खिड़की से पसीने में तरबतर होकर कंफर्म टिकट ले आना किसी युद्ध में विजयी होने से कम उत्साह की बात न थी। टिकट के घर आते ही घर थोड़ा-थोड़ा खाली होने लगता और गाँव वहाँ भरने लगता। आम और लहसुन पुदीने की चटनी के स्वाद से लेकर साथ में घटने वाली हर घटना में गाँव उपस्थित होता। यह मानसिक स्तर के साथ-साथ भौतिक स्तर भी उतना प्रकट होने लगता। मम्मी-पापा के साथ जाने पर एक सहूलियत यह होती है कि वह अपनी नज़र में सब तय करते। हम लगता है, अपनी यादों में छोटे ही बने रहना चाहते हैं। हमेशा। पर। पता नहीं क्या। अभी भागना है इसलिए छोड़े दे रहा हूँ। वापस लौट कर देखेंगे। बहरहाल।

कभी ऐसा होता हम जहाँ सबको छोड़ कर आयें वह सब हमारे वहाँ से हटते ही थम जाएँ। वहीं की वहीं सब चीज़ें रुकी रहें। रुक जाएँ। फ़िर साल दो साल बाद हम जाएँ तो सब बिलकुल उसी क्षण से दोबारा शुरू हो जाएँ। हम जाएँ और रुकी थमी हुई सब गतिविधियाँ फ़िर से घटित होने लगें। जहाँ जो लम्हा छोड़ा वहीं से कोई धागा सिरे पर मिल जाये तो कैसा हो? जब तक हम सामने न हों, आँखों से न देख रहे हों, तब तक उनमें कोई हरकत उनमें न हों।

ऐसा शायद सपनों की दुनिया में होता होगा। पर हम ऐसी किसी चीज़ को कैमरे के नाम से जानते हैं।

टिप्पणियाँ

इस ब्लॉग से लोकप्रिय पोस्ट

बेतरतीब

आबू रोड, 2007

हंस में आना

शहतूत आ गए हैं: मेरी पहली किताब

हिंदी छापेखाने की दुनिया

जगह

वापसी