कुछ न कहना, कम कहना

मेरे अन्दर काफ़ी कुछ बदल रहा है। यह दिखता नहीं। महसूस होता है। महसूस होना इस चवालीस डिग्री में बाहर घुमने से पैदा हुई ऊब और पसीने की गंध की तरह है। अब अपने बारे में लिखने का मन नहीं होता। बस ऐसे ही कुछ-कुछ फुटकर जगहों में कहने की आदत बहुत सही बन पड़ी है। किसी को अपने मन की थाह लगने न देने का हुनर भी बहुत मेहनत से सीखा है। कागज़ पर तो खैर, यह सब पता नहीं कहाँ पीछे छूटता जा रहा है? साल होने वाला है और इस दरमियान डेढ़ सौ पन्ने भी नहीं कह सका। कैसा लिखने वाला ठहरा? निहायत आलसी। निकम्मा। कामचोर। यही तो मेरी पहचान रह गयी है, मेरे अन्दर। कुछ भी न करने वाला, नाकारा।

कल रात से बस यही सोचे जा रहा हूँ, यह चप्पल किस दिमागी उपज का हिस्सा रही होगी? आज जिन शक्लों में हम चप्पलों को देख रहे हैं, उन्होंने कितनी सदी पहले चलना शुरू किया होगा। चमड़ा किस जानवर का रहा होगा? धागे किस तरह धागे बने होंगे? वह सूई तलवार से काफ़ी पहले की रही होगी। चप्पलों का एक इतिहास सिर से भी तो जुड़ता है। जब किन्हीं का मन हो, तो चप्पल उठाकर पीटने दौड़ पड़ते हैं। हमारी भाषा के मुहावरों में इनका विशद वर्णन है। हम ऐसे समाजों में से हैं, जहाँ औरतों को आदमियों के पैरों की जूते-जूतियाँ कहा गया है।

यह अमानवीकरण सदियों से हमारे समाजों की विशिष्ट पहचान है। बचपन में हमारे लिए यह कल्पना करना भी बड़ी दुःखदाई घटना होता था कि कैसे(?) कोई अपने पैर से चप्पल निकाल कर किसी पर निशाना साधने लग जाता होगा। हम रीलेक्सो की चपल्लें पहने-पहने हवा में उछाल दिया करते। बिना सोचे समझे वह हमारा हवाई जहाज़ बन जाती। फ़िर हम देखते एक पितानुमा व्यक्ति अपने छोटे से बेटे पर दूर से फ़ेंकते। उनके मन में उत्कट इच्छा होती कि वह उसे लग जाये और चोट के रूप में वह कोई निशान छोड़ जाये। बड़े होने पर पिता की इस अभिधा से काम नहीं चलता। साधन बदलने पड़ते हैं। तब के जूते चप्पल चमड़े की जुबान में तब्दील हो जाते हैं।

देखते-देखते हमारी भाषा इस तरह विकास करती रही और हम सब पता नहीं किस भाषा की संरचना देखते रहे।

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