बची हुई संभावना

वह एक बची हुई संभावना का नाम है, जिसे उसकी पत्नी ने अपने गर्भ में रचना शुरू किया। गर्भ एक संसार में आने से पहले एक संसार है। इसीलिए उसकी स्मृतियाँ हम सबके पास होंगी। हो सकता है, हम इस संसार की तरह उस संसार को किन्हीं शब्दों, बिंबों, प्रतीकों के भाषिक वाग्जाल से सपने बुनने की इच्छा से भर गए हों। लेकिन यह संभव नहीं है। यह ऐसा संसार है जब हमारे पास, जिसे हम भाषा कहते हैं, उसका वह ढाँचा नहीं था। जिसके सहारे हम उस खड्डी पर तानाबाना देख भी पाते। हम अपने आपको इसलिए इस संसार का नियामक मानने लगते हैं क्योंकि हमारे लेखन में अपने अतीत में जाने की हैसियत है। पर तब कोई क्या करेगा, जब हम गर्भ में थे तब हम उस गधे, मच्छर, मछ्ली, पंछी की तरह ही थे जो सिर्फ़ और सिर्फ़ जीने में इतने डूब जाते हैं कि इस तरह किसी के लिए कुछ भी रचकर जाने की कोई तमन्ना उनके भीतर जन्म नहीं लेती। वह हमसे कई गुना समझदार हैं। उनके यहाँ इतिहास नहीं, स्मृतियाँ हैं। अगर कोई उन्हें लिखता, तो उनके पास जीने का एक बना बनाया नक्शा होता। उन सड़कों, गलियों, चौराहों का पहले से उपलब्ध तथ्यात्मक ज्ञान उन्हें इस कदर रचनात्मक नहीं बनाता।

कहीं देखा है, किसी उड़ने वाले पक्षी को, जो अपने हिस्से की बातें आगे आने वाली पीढ़ियों के लिए लिख कर गया हो? वह कहीं किसी जगह से अपने बीते दिनों के संघर्षों और उपलब्धियों को पढ़ नहीं सकता। उसे अपने जवाबों पर एक दिन ख़ुद पहुँचना होगा। वह उसके निर्णय होंगे, जो उसे बनाएँगे। वह किसी पूर्वाग्रह से ग्रस्त नहीं होंगे। उसे हर बार उन हिंसक जीव जंतुओं का वर्गीकरण स्वयं करना होगा। उसे अपनी मित्रता दोबारा से रचनी होगी। उसके लिए क्या खाने योग्य है, उसे एक बार फ़िर तय करना होगा। उसे वह हर बात, जिसे उसके माता-पिता तय कर चुके थे, उसे उन तक अपनी क्षमताओं का इस्तेमाल करके पहुँचना होगा।

हमारे शब्दों में यह कितना निर्मम निर्णय है। लेकिन इस तरह उनमें हर पीढ़ी ख़ुद अपने घोंसले के लिए समान इकट्ठा करती है। वह उन सभी बातों को दोबारा अपने अंदर तक उतरने देती है, जिससे पिछली पीढ़ी गुज़र चुकी है। उनमें इस बात का कोई अहंकार नहीं है। यह इस तरह पुनरावृति भी नहीं है। उनके पास परंपरा, संस्कृति, सभ्यता जैसे भारी भरकम शब्दों का भंडार नहीं है, फ़िर भी वह उसे अपने जीवनकाल में दोबारा गढ़ते हैं।

हो सकता है, कोई पक्षी वैज्ञानिक मेरी बातों से इत्तेफाक न रखते हुए सलीम अली बनने की कोशिश करने लगे। पर दोस्त जादा दिमाग चलाने की जरूरत नहीं है। पंछी कह देना तो बहाना है। ऊपर एकएक कर गधा, मच्छर, मछ्ली भी लिखा गया है। उनके बारे में क्या कहना है आपका? क्या यह बातें सिर्फ़ पंछियों के लिए हैं। तब हमें तो तत्काल प्रभाव से लिखना छोड़ देना चाहिए। और इस तरह, मैं अंतर्विरोधी बात पर अपनी बात ख़त्म करता हूँ।

टिप्पणियाँ

इस ब्लॉग से लोकप्रिय पोस्ट

आबू रोड, 2007

शहतूत आ गए हैं: मेरी पहली किताब

हिंदी छापेखाने की दुनिया

जगह

हंस में आना

वापसी

आठवीं सालगिरह