केले का छिलका और खिड़की

केले के छिलके को खिड़की से फेंकते हुए, ख़ुद केले का छिलका होने की इच्छा से भर जाना, कहीं से कूदने की तमन्ना का फिर से जन्म लेना नहीं है। यह ऊँचाई से कूदने के अधूरे सपने का प्रतिफलन भी नहीं है। तब प्रश्न उठता है, यह क्या है? शायद इस खिड़की से हवा में नीचे जाते हुए केले के छिलके के साथ उस भाव से भर जाने का ख़याल है, जिसमें एक मंज़िल से नीचे आते वक़्त वह छिलका किन भावों से घिर जाता होगा? उसे नीचे आते हुए कोई चोट लगती है, उसका एहसास बस उस आवाज़ से लग पाता है, जो उसके ज़मीन से टकराने के बाद आती है। हम सब भी इसी तरह कहीं-न-कहीं से टकराते हुए आवाज़ करना चाहते होंगे। यह आवाज़ की संरचना में ख़ुद बख़ुद कहने की ताकत की तरफ़ इशारा ही नहीं, कहीं सुने जाने की ख़्वाहिश भी है। आवाज़ किन्हीं ध्वनियों के एक साथ निकलने की परिघटना है। जो बार-बार उसी तरह घटित होगी, जब-जब हम उस छिलके को इस खिड़की से नीचे फेंकते रहेंगे। एक दिन होगा, जब यह आवाज़ दब जाएगी। खिड़की दीवार में न रहकर रेलगाड़ी की दीवार में चिपक जाएगी। तब उसकी ध्वनि की सघनता भले इस एक मंज़िला इमारत से गिरते हुए, उसके मन में बनती भावुक रक्त संचार प्रणाली के अनुपात में बिलकुल बराबर हो, पर उसकी तीव्रता में स्थिरता का अभाव उसे ढक लेगा। 

चलती हुई रेलगाड़ी कहीं भी स्थिर भूमि का निर्माण नहीं करती। वह पटरियों पर दौड़ते हुए लगतार एक नयी ज़मीन पर स्थगित अवकाश की तरफ़ बढ़ती जाती है। जब हम गति में होते हैं, तब हमारी सुनने की शक्ति उन ध्वनियों में इतनी ही तीव्र गति से वर्गीकरण नहीं कर पाती। हम तब असल में सुन भी नहीं पाते हैं।

जिन्हें यह अभिधा समझने में कठिनाई हो रही है, उनके लिए थोड़ा सरल करते चलते हैं। यह स्थिर ज़मीन, जिसके लगभग एक मंज़िल ऊपर एक रुकी हुई खिड़की, मेरे कमरे का अवकाश है, जिसका उपभोग करते हुए मैं इन पंक्तियों को रच रहा होता हूँ। जब मैं इस कमरे के बाहर होता हूँ, तो लगातार मेरे पैरों के घर्षण से वह स्थिर जमीन पीछे छूटती जाती है। तब ख़ुद को इस तरह महसूस करता हूँ कि उन सारी घटनाओं को देखने के लिए मेरे पास जो खिड़की है, उसमें कई घटनाएँ एकसाथ घट रही हैं और उनकी सघनता, तीव्रता, ताप आदि को पकड़ पाने, वहाँ ठहरे रहने का अवसर मुझे यह अवकाश नहीं देता कि उन्हें यहाँ कमरे में लाकर दोबारा केले की तरह खा सकूँ और उसके छिलके को नीचे फेंकते हुए उसके अंदर की ध्वनि को इन कमज़ोर जिद्दी कानों से सुन सकूँ। 

अब थोड़ा लग रहा है, थोड़ा तो समझ आया होगा। नहीं आया, तब भी मैं कुछ नहीं कर सकता।

टिप्पणियाँ

इस ब्लॉग से लोकप्रिय पोस्ट

आबू रोड, 2007

शहतूत आ गए हैं: मेरी पहली किताब

हिंदी छापेखाने की दुनिया

जगह

हंस में आना

वापसी

आठवीं सालगिरह