कभी बेमतलब होना..

हम सब दुनिया को एक ख़ास खाँचें में ढालने के आदी हैं। उसका ऐसा नक्शा जो कभी किसी ने तय किया, वही आज तक दोहराया जा रहा है। सब एक ख़ास तरह की परिणिति को प्राप्त कर लेना चाहते हैं। हमारे मनों में उन छवियों का वह हिस्सा कितना निर्मम है, पता नहीं। वहाँ कोमलता का कोई कतरा है या नहीं, कहा नहीं जा सकता। पर वह साँचें वहीं है। सिराहने के पास। सब कितनी फ़िक्र में हैं। कहीं कोई दिन उस टकसाल के बाहर से हमारे अंदर आ गया, तब क्या होगा? हम किस तरह उस पर अपनी प्रतिक्रिया देंगे। हम एकदम घबरा जाते हैं। घबराना कमज़ोर होना नहीं बल्कि सवालों के जवाब न मिलने की हड़बड़ी है। जैसे इश्क़ के किसी पल ज़िस्म पर आते ही हम नंगे होने लगते हैं। बिलकुल वैसे। बिलकुल इसी क्षण कोई दरवाज़े की दूसरी तरफ़ साँकल पीटने लगे, तब जवाब में हम कुंडी नहीं खोलते। चुप रहते हैं।

यह ढलती रात और भारी पलकों के बीच मेरे थके हुए दिमाग की उपजी शरारत लगती है, जो इस तरह विषय से दूर ले जाती लग रही होगी। पर मैं भी कोई कम चालाक आदमी नहीं। कईयाँ किस्म का जुगाड़ू हूँ।

इस भाषा में अपने मन के भीतर आस पास की लड़कियों के लिए मेरे मन में चलने वाली उधेड़बुन तो है ही साथ ही साथ दुनिया को ढालने वाली टकसाल का साँचा भी है। किन्हीं बन्धु बांधवों को इस तरह ढलने में ऊब हो रही हो, तो उनसे माफ़ी चाहूँगा। वे जा सकते हैं। उनके लिए यह दृश्य कल्पनातीत होगा। पर मेरे इक्कीसवीं सदी के सोलहवें साल में लिखने से कई दशक पहले पैरिस का एक फ़ोटोग्राफ़र इसे उतार चुका है।

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