वक़्त की क़ैद

इससे ज़ादा यह हमें और क्या करेंगे? हम सब काम वक़्त पर करने के लिए ख़ुद को तैयार करते रहते हैं। तय वक़्त एक अजीब क़िस्म की संरचना है। जिसके बाहर हम कुछ भी नहीं हैं। ऐसा ढ़ांचा जिसमें सब समा जाता है। उमर इसी तरह कितने बंद खाँचों में हमें कैद कर लेती है। सब कुछ वक़्त के उस दायरे में सिमट कर रह जाता है। जिसमें हम कहने न कहने के बीच में हमेशा झूलते रहते हैं। मैं जो भी कहना चाहता हूँ, वह शायद इसके पीछे कहीं छिप जाये। पर जो सामने भी होगा, वह भी कम ज़रूरी बात नहीं होगी। मौसम ने शायद यही सीमा कहीं पीछे छोड़ दी है। वह भी मनमर्ज़ी करने लगा है। उसका ऐसा करना हमें हरकत लगता है। अपनी ज़िम्मेदारियों से भाग लेने के लिए यह बहुत महत्वपूर्ण तर्क है। जब हमने अपनी सीमाओं को तोड़ दिया, तब मौसम या पेड़ या मिट्टी, दिवार, कोटर में कहीं उग जाने वाले पौधे के लिए यह क्यों मायने रखे? हमारे लिए मायने रखता है, वक़्त पर पानी का आ जाना। इसतरह हम हमेशा तयशुदा चीज़ों के लिए ख़ुद को तैयार करने में लग जाते हैं। हम सोचते हैं, कुछ भी इसके बाहर नहीं है। यही हमारी सबसे बड़ी हार है। लेकिन अगर हम ऐसे हैं, तब यह दुनिया हमने नहीं बनायीं। यह दुनिया उन्होंने बनायीं, जो ख़ुद को इस वक़्त के दायरे से बाहर ले जा पाये।

हम शायद यही बात भूल गए हैं। किसी को याद आ जाये और कोई कुछ कर ले, इसीलिए इसे यहाँ याद कर दोबारा लिख दिया। शहर ऐसे ही ठहर गए हैं। उमर की तरह। हमारी तरह। वक़्त की तरह।

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