आज का दिन

शनिवार। नौ अप्रैल। साल, दो हज़ार सोलह। दिल्ली। पता नहीं वक़्त के साथ यह कैसी तारीख में तब्दील होती जाएगी? इसकी बनावट में ऐसा क्या है, जो मुझे पूरे दिन घूमने और देर रात घर पहुँचने के बाद भी भावुक किए जा रहा है। हर दिन का अपना इतिहास होता है। फ़िर किसी दिन किसी घटना का घट जाना, हमारी स्मृतियों में उसे हमेशा के लिए सुरक्षित रख देता है। यह दिल से लेकर दिमाग तक अंदर घर किए रहती है। यह दिन बिलकुल ऐसे ही शुरू हुआ। आज ईपीडबल्यू में मेरा एक लेख आया है। कहने को यह एक साधारण सी घटना है किन्तु इसकी असाधारणता का अंदाज़ आने वाले दिनों में ख़ून की तरह घुलती साँसों के हवाले से पता चलता रहेगा।

यह लेख गाँव के बारे में है। गाँव से शुरू होता हुआ, इस शहर तक आता है। यह जिस भाषा में लिखा गया है, वह भाषा बाबा को नहीं आती है। उनका कोई ईमेल अकाउंट नहीं है। और उन्हें कभी डाक से भेज भी नहीं पाऊँगा। वह इसे पढ़ नहीं पाएंगे। शायद गाँव में गिनती के कोई दो-तीन लोग होंगे, जो कभी जान भी पाएंगे कि दिल्ली में बैठे एक पोते ने अपने बाबा और दादी के बारे में लिखा है। दादी तो हमारे छुटपन में ही चली गईं, उन तक मेरी बात किसी तरह पहुँच सकती तो पहुँचा देता। दादी बात बात में याद आती हैं। बस याद आती हैं। कभी सच में आती नहीं हैं। दो साल हुए बाबा से मिल नहीं पाया। इस साल गाँव जाएंगे, तब उन्हें बताऊँगा।

यह भाषा असल में हमारे घर में बस हम दोनों भाइयों को कामचलाऊ आती है और एक तुम ठहरी और एक तुम्हारी ननद। लिखना तो ख़ैर किसी को तो क्या ही आता है। इसे लिखने के लिए तीन महीने लिए। रवि से इसको पढ़ने लायक बनवाया। दिसंबर में जाकर उन्हें भेजा। आज, जब मैं अंदर से इनकी वैबसाइट को देखने में पिछले छह हफ्तों से इकट्ठा हो रही हड़बड़ी में बिलकुल भी नहीं था, अचानक मेरा नाम दिख गया। जो पिछले मार्च से सिर पर सवार थी, वह इच्छा आज पूरी हो गयी। सबसे पहले पापा को बताया। फ़िर तुम्हें फोन किया। भाई शिमला गया हुआ है इसलिए उसे थोड़ी देर बाद बता सका। मम्मी को सोमवार ईपीडबल्यू लाकर सीधे दिखाऊँगा।

पता नहीं क्यों रोने का मन हो रहा है। यह अँग्रेजी में मेरा पहला ख़त है। जिसे कभी कोई नहीं जान पाता, उसमें हमारे इस घर की कहानी है। यह कुछ कहने की नहीं, ख़ुद को जताने की पहली किश्त है।

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