तस्वीर के बहाने डकार

उठकर नीचे गया। पानी भरते हुए पानी पिया। पानी वापस लौटकर फेफड़े और गले के आस-पास अभी तक नहीं आई डकार में बदल गया और उसने बताया अभी भी कितना कुछ पचने के लिए बाकी है। उस डकार में पुदीने की चटनी और आलू की पकौड़ियों का स्वाद आता रहा और मुझे याद आती रही दो साल पहले की एक याद। भले मेरा मन न हो, तब शादी के वक़्त मेरे चहरे पर दाढ़ी नहीं है। सब यही चाहते थे। वही हुआ। मैं ख़ुद अपने आपको दाढ़ी में उस करोल बाग से खरीदी शेरवानी में राजेश खन्ना तो क्या जुबली कुमार राजेन्द्र कुमार भी नहीं लग पाता। पर ख़याल है। ख़याल का क्या(?) वह ऐसे ही आते रहते हैं। इधर जब हम चार दिन बाद दिल्ली लौटे तब देखा उसने अपनी शादी की तस्वीर लगाई है। दोनों साथ खड़े हैं। उन्होंने लहंगा पहना हुआ है और वह ख़ुद शेरवानी में है। यह तस्वीरें अफ़वाहों के बहने के बाद उन्हें खत्म करने की गरज से वहाँ मौजूद थीं। शादी बेगूसराय या पटने में कहीं हुई होगी। पर एक चीज़ जो देखने लायक थी, वह उसके नाम में तबदीली रही। कितना सोचा होगा उसने। शादी कर रहा है। फ़िर नाम क्यों बदलना पड़ा? बदलना नाम का नहीं था बल्कि उसके पिछले हिस्से का हटा दिया जाना था। होगा कुछ। नहीं पूछा। कभी नहीं पूछूंगा।

अभी भी मैं बड़ी चालाकी से कई ज़रूरी ब्योरे छिपा ले जा रहा हूँ। कुछ ख़ास नहीं बता पा रहा। एक दिन आएगा जब गोंडवाना एक्सप्रेस में मिले उस लड़के को जवाब की तरह इन दोनों का नाम दे पाऊँगा। लेकिन जो बात कहनी थी वह लगातार कहीं छिपती जा रही है। मच्छर इस बंद कमरे में कभी मेरी पीठ पर कभी मेरे पैरों पर मंडरा रहे हैं। मन कर रह है, छोड़ कर भाग जाऊँ। पर नहीं। एक दिन पर वापस लौटते हैं। वह एक दिन इसी दुनिया में आएगा, जब हम सबके नाम इस मुलायम मिट्टी में मिल जाएंगे। हम समझेंगे यह भी एक लक्षणा है, लेकिन मेरे दोस्त यह शब्दशक्ति से निकलने वाली व्यंजना ही होगी जो उसे मुहावरों की अर्थध्वनियों में गुम कर देगी। कहीं कोई गली नहीं मिल पाएगी, जहाँ हमारा साथी उस पते पर दोबारा लौट पाये। वह कमरे की दीवारें उनमें चिपकी छिपकली हमारे अंदर समा जाएगी। हम उस छिपकली की पूंछ से पहचाने जाएंगे। पलस्तर से निकलती एक ख़ास गंध हमें याद दिलाएगी हमारे पूर्वजों ने कभी पेड़ लगाए थे। वह साँस डकार में तभी बदल पायी जब उन्होने इस मिट्टी जैसे इस धरती के हृदय में जंगल से इकट्ठे बिए बोये थे। वह सदियों पहले हमारे अनाज की शक्ल अख़्तियार करने का वक़्त रहा होगा।

यह वही वक़्त रहा होगा, जब हम अपने नाम में अपने मायने खोजने के लिए निकल पड़े होंगे। तब हमने तालाब खोदे होंगे। तालाब का पानी पिया होगा। जब वह गले तक आ गया होगा, तब इस पुदीने वाली डकार फ़िर आई होगी। उस क्षण को दोबारा दोबारा पाने के लिए हम नदियों के लिए हिमालय की बर्फ़ पिघलाने लगे। वही गंगा जमना बनकर इन मैदानों में फूट पड़ीं। फ़िर एक दिन आया जब हम सब कुछ भूल गए। अपना नाम, डकार, पानी, धरती, मिट्टी, बिए, हवा। सब कुछ। सब भूल कर हमने शादी वाली वह तस्वीर देखी। जिसमें उसे लगाने वाले का अधूरा नाम देखकर बौरा गए। बौराये-बौराये बैठ गए लिखने। फरजी वक़्त बर्बाद किए हम सबका। डकार भी नहीं लेने दिये बीच में। दोनों तो अब शादी के बाद दिल्ली आ चुके हैं। भोगल में हैं। निज़ामुद्दीन के पास। और वो दोनों पारसाल वाले अब कल गए नैनीताल। अट्ठाईस की सुबह लौट रहे हैं शहर। तब तक ऐसे ही मिट्टी होते रहेंगे सब। समझे? मत समझो!!

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