आवाज़ें..

पता नहीं वक़्त के किसी खास क्षण में मेरे कानों में लकड़ी को ज़मीन पर पटकने से निकलने वाली आवाज़ सुनाई देने लगी है। हम सबको पता है, हमारे कान बिलकुल ठीक हैं और 'डॉल्बी सिस्टम' से कई गुना बेहतर सुने जाने लायक 'मकैनिज़्म' रखते हैं। पर शायद यह इसकी बेहतरी ही है कि कुछ आवाज़ें अपने आप अंदर दाख़िल होकर घुलने लगती हैं। जैसे, जब तुम मुझसे बात नहीं कर रही होती तब भी मैं तुम्हें सुन रहा होता हूँ। ऐसे हम दोनों ख़ूब बात किया करते हैं। तुम भी करते होगे। पीछे बैठी बस में खिड़की से बाहर झाँकती लड़की से। बगल में चिपककर बैठे उस लड़के से। दिल से निकलती धड़कनों के बीच होंठों के स्पर्श से पैदा हुए स्पंदन में हम दोनों एक साथ सुन रहे होते हैं। सुनना सिर्फ़ कान से नहीं होता, दिल में उतरते जाने से भी होता होगा। जो यह नहीं समझ पाते, वह सिर्फ़ इस दुनिया में कुछ साल जीते हैं, जीकर मर जाते हैं। आवाज़ें जिंदगी में रंग भरती हैं। उनमें एक खास गंध होती है। उनकी छुअन मुलायम से मुलायम फूल को भी मात दे सकती है। उन उमर के साथ खुरदरे होते हाथों में पानी लग लग कर खाल को गला रहा होता है। पर उनमें स्वाद की हमारी परिभाषाएँ लिखी होती हैं।

सारंग के परों की भिनभिनाहट। शहद इकट्ठा करती मधुमक्खी। पंछियों के घोसलों को न बना पाने की न क़ाबिलियत और ऐसी बहुत सारी बातें, जो हमें एहसास करती हैं, इस दुनिया में हम ही सब काम करने वाले हैं, ऐसा सोचना कितना बेमानी है। हम चींटी की तरह बारीक सुराखों में जाकर नहीं समा सकते। पेड़ के पेड़ दीमक कितनी सालों में ख़त्म कर देती हैं, इसका अंदाज़ भी हम नहीं लगा पाते। वह गरम तारकोल की महक हमें मदहोश नहीं करती।

हम बस सुन सकते हैं। जिसके लिए एक दिल है और दो जोड़ी कान। इसका सही इस्तेमाल हमें एक बेहतर इंसान बनाने के लिए काफ़ी है। जो नहीं सुन रहे, वह आप जानते ही हैं, कौन हैं। उनकी पहचान सबसे आसान है।

टिप्पणियाँ

इस ब्लॉग से लोकप्रिय पोस्ट

बेतरतीब

आबू रोड, 2007

हंस में आना

शहतूत आ गए हैं: मेरी पहली किताब

हिंदी छापेखाने की दुनिया

जगह

वापसी