कल उदास लौटकर

सिर भारी रहने लगा है के बाद कुछ भी कहा जा सकता है। जैसे सूरज की किरणों में जो हायड्रोजन बम की ताकत है, उसे उत्तर कोरिया ने कुछ-कुछ अपने क़ाबू में कर लिया है और थोड़ा थोड़ा सूरज उनके यहाँ हमेशा मौजूद रहने लगा है। वह उससे खिचड़ी बनाएँ या पानी उबालें, यह उनके दिमाग के ऊपर बने हड्डियों के स्थापत्य में घूमती, ख़ून चूसती जुएँ बताती रहेंगी। जैसे इस बार ठंड इतनी नहीं हुई कि एनडीटीवी के ग्रेटर कैलाश के दफ़्तर के बाहर गरम कपड़ों का अंबार लादे ट्रक के ट्रक खड़े हों।

पता नहीं इन्हें लिखने के बाद मुझमें जुगुप्सा भर जानी चाहिए थी। पर भर गया हूँ, झूठे गुस्से और उतने ही खोखले अवसाद से। इनसे बाहर यह दुनिया समझ में नहीं आती। यह उससे भी बदतर होती जा रही है। एक दिन होगा जब कोई कहीं झरने के किनारे बैठा होगा पर उसे पता नहीं होगा यह किसी भाषा में झरना कहा जाता है। वह उसे कुछ कहने के लिए किसी अनाम इच्छा से भर जाएगा। तब एक और लिपि इस मिट चुकी दुनिया और रेडियोधर्मी विकिरण से प्रभावित रेत के गर्भ से परमाणु बम की तरह एक और विस्फोट करते हुए निकलेगी। फ़िर उसी लिपि में कोई माँ जैसा शब्द होगा। कोई शब्द पिता के लिए प्रयोग में लिया जाएगा। किसी शब्द से आँसू को भी संबोधित करना पड़ेगा। हम इस धरती से उपजे इसी मिट्टी में दोबारा मिलने की तय्यारी में एक बार फ़िर जुट जाएँगे।

अणु से बनी दुनिया में अपना संसार रचेंगे। हम हारेंगे नहीं। हम मर जाएँगे। उस अफ़सर को बताना होगा, उसने क्या किया, जो सब उसकी तरफ़ टकटकी लगाकर खड़े हुए हैं। वह बताता क्यों नहीं उसकी भी अब हत्या होगी। जैसे हम सबकी हत्या एक दिन यह देश मिलकर करेंगे। वह शायद इसलिए नहीं बता पाएगा क्योंकि उसके हिस्से की भाषा अभी तक गढ़ी नहीं गयी है। वह हम सबके यहाँ से चले जाने के बाद बनाई जाएगी। जैसे बहाने बनाए जाते हैं। वह कैसा भोपाल था, जो हमने तीन साल पहले देखा। कहीं कोई ऐसी चीज़ नहीं दिखाई दी, जहाँ हम तीस साल पहले की कोई याद देख कर सिहर जाते। हम दो कदम चलते चार कदम लौटकर वापस आते। वह मानव संग्रहालय क्यों नहीं उस त्रासदी को अपने सीने पर तमगे की तरह चिपकाए हमें बताता कि उसने इतिहास को भुलाना सीख लिया है।

यह निरर्थक मौन तब उसी भाषा और उसकी अदृश्य लिपि में कुम्हार की मिट्टी की तरह पाथते हुए कोई मेरी बिटिया जैसी लड़की रच रही होगी। जो मुझे देखते ही दौड़ते हुए आएगी और मुझसे चिपटते ही झर-झर रोने लग जाएगी। वह कह नहीं पाएगी जो वह कहना चाहेगी। हिचकियाँ रोके नहीं रुकेंगी। प्यास से गला सूख जाएगा। कोई शब्द नहीं निकलेगा। भाषा हमारी तरह मर जाएगी। वह बस मुझे नरौरा से दिल्ली की दूरी बताते हुए रोना चाहेगी। मैं उसे गंगा किनारे उस भव्य दृश्य को देखते हुए भी नहीं कह पाऊँगा। इसकी बूँद-बूँद इस कदर सूख चुकी होगी, जिसमें पानी का एक कतरा भी नहीं बचा होगा। ऑक्सिजन के दो अणु पिघलकर भी पानी को गीला नहीं कर पायेंगे। फ़िर एक दिन आएगा, हम सब अपने पसीने को चाटते हुए एक दिन मर जाएँगे। मर जाएँगे, इस दुनिया को बेमौत मारकर।


{कल जबसे वहाँ से लौटा हूँ यह देखकर परेशान हूँ, हम लोग परेशान क्यों नहीं हैं। हम क्यों नहीं कोई आवाज़ उठा पाते। हम जीना चाहते हैं। हम मरना नहीं चाहते। हम वहीं रामघाट पर बैठे सात रुपये की कुल्हड़ की चाय पीते हुए सारी ज़िन्दगी गुज़ार देना चाहते हैं। यह ज़िन्दगी मरमर कर नहीं थोड़ा, जीकर बिताना चाहते हैं। सच, एक दिन होगा, जब अब लगता है, यह कहने का वक़्त आ गया है के यह शहर छोड़कर गाँव जाने का मामला नहीं है। वहाँ जाकर भी क्या होने वाला है। असल में एक ख़ास तरह की जीवनशैली में इन सारी तकलीफ़ों के मूल छपे हुए हैं। सोचता हूँ, आज स्वयं प्रकाश अपनी कहानी संधान को किस तरह लिखते? पता नहीं। कोई जवाब नहीं।}

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