शहतूत आ गए हैं: मेरी पहली किताब

किताब का कवर 
जो सब लोग मेरे लिखे हुए को एक जिल्द में पढ़ने की इच्छा से बहुत समय से भरे हुए थे, भले उनकी संख्या उंगली पर गिने जाने लायक हो, यह किताब की शक्ल में अब सबके सामने है । इस जटिल वाक्य की संरचना की तरह हमारे आस-पास की दुनिया भी है । मैं उसे यहाँ दोहराना नहीं चाहता । चाहता तो था, यह किताब कागज़ पर छप कर आती । खैर, उस तफसरे में भी जाने का अब मन नहीं है । इस किताब को डायरी में लिखे हुए ‘आत्मपरक गद्य’ की तरह माना जा सकता है । ‘पर्सनल ऐसे’ होते हैं जैसे । इसमें कुछ इस शहर की बातें हैं । कुछ इस दुनिया के किस्से हैं । छोटे-छोटे अंशों में स्मृतियाँ हैं, उनकी कोमलता में थोड़ी नमी भी है । कुछ उन सपनों के टूट जाने और बिखर जाने की टीस भी रही होगी । जो वहाँ लिखते हुए मेरे शब्दों और वाक्यों में उतर आए हैं । आप इसे इस समय पर एक बयान भी मान सकते हैं । जहाँ कोई मुझे देख नहीं रहा था, अपने समय और काल पर नियमित अंतरालों में कुछ-कुछ दर्ज करता हुआ चलता रहा । हो सकता है, भाषा कहीं-कहीं वास्तविकताओं की तरह जटिल हो गयी हो । इसे मेरे दोष की तरह नहीं देखा जाना चाहिए । इसी छोटी-सी भूमिका के साथ अपने कुछ अग्रजों और साथियों को यह पुर्जा भेज रहा हूँ । यदि मैं बहुत महत्वाकांक्षी होता, तो अब तक, एक बड़ा आयोजन करने वाला प्रकाशक जुटा चुका होता । मैं इस आयोजन में आप लोगों को शामिल कर रहा हूँ । आप इसमें से चुपचाप निकल जाने के लिए स्वतंत्र हैं । यह आपकी इच्छा पर निर्भर है । मैं कुछ नहीं कर सकता । न कुछ करने की इच्छा ही अब बची है ।

कुछ नाम जो मन में तैर रहे हैं उनमें से कुछ हैं: संजीव सर, विभास सर, बलवंत मैम, चन्दन पांडे, मनोज पांडेय, अविनाश मिश्र, आलोक रंजन, विजेंदर मसिजीवी, अरविंद शेष, प्रभात रंजन, सागर, राकेश, बलराम, अमित ओहलाण, दिव्या विजय, देवेश, टेकचंद, सलमान, पवन कुमार, लवकेश और अरुण । पूजा और सागर यह किताब तुम दोनों के लिए भी है । बाकी नाम मुझे अभी सूझ नहीं रहे हैं । वह भी ख़ुद को यहाँ समझें । किताब कल रात ढाई बजे रात को ‘अमेज़न’ की ‘किंडल’ सेवा पर ख़ुद प्रकाशित कर दी गयी है । कीमत को इसलिए भी रखा जाना ज़रूरी है, क्योंकि अगर इसे यहाँ मुफ़्त बाँट रहा होता, तब मुझमें और सड़क किनारे अपनी किसी कंपनी के सामान वितरण आयोजित करने वाले व्यक्ति में कोई अंतर कैसे कर पाता ? मुफ़्त के चक्कर में तो पूरा बाज़ार पटा पड़ा है । इच्छा न भी हो, तब भी गैर-ज़रूरी समान घर में दाख़िल हो जाता है । फिर मैं तो आपने दिमाग में दाख़िल होना चाहता हूँ । थोड़ा दिल में उतरना चाहता हूँ । किताब की कीमत एक सौ निन्यानवे रुपये रखी है । कुछ रकम चुकाकर अगर यह आपके आपने मोबाइल या किंडल डिवाइस पर आएगा, तब उसकी कुछ कीमत अपने आप बढ़ जाएगी । आप देखेंगे तो । क्या लिखा है, जिसके लिए कुछ चुकाना पड़ा । बहरहाल, यहाँ उन लोगों को बहुत दुख होगा, जो सतही और बेकार समीक्षा लिखने के लिए भी कागज़ पर छपी कृतियों की समीक्षार्थ प्रति की प्रतीक्षा करते रहते हैं । उन्हें पुस्तक खरीदकर पढ़नी होगी । अगर वह ख़ुद को इस इच्छा से भर पाते हैं, तो पढ़ें और बता सकें तो बताएं । कि किताब पढ़ी है । अरे! इस सबमें किताब का नाम तो बताना बिलकुल भूल गया । किताब का नाम है, ‘शहतूत आ गए हैं ’ । आपकी सहूलियत के लिए अमेज़न का लिंक लगाए दे रहा हूँ । 

साइट पर किंडल किताब का लिंक : https://www.amazon.in/dp/B087Z2QR7H/

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