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शहतूत आ गए हैं: मेरी पहली किताब

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जो सब लोग मेरे लिखे हुए को एक जिल्द में पढ़ने की इच्छा से बहुत समय से भरे हुए थे, भले उनकी संख्या उंगली पर गिने जाने लायक हो, यह किताब की शक्ल में अब सबके सामने है । इस जटिल वाक्य की संरचना की तरह हमारे आस-पास की दुनिया भी है । मैं उसे यहाँ दोहराना नहीं चाहता । चाहता तो था, यह किताब कागज़ पर छप कर आती । खैर, उस तफसरे में भी जाने का अब मन नहीं है । इस किताब को डायरी में लिखे हुए ‘आत्मपरक गद्य’ की तरह माना जा सकता है । ‘पर्सनल ऐसे’ होते हैं जैसे । इसमें कुछ इस शहर की बातें हैं । कुछ इस दुनिया के किस्से हैं । छोटे-छोटे अंशों में स्मृतियाँ हैं, उनकी कोमलता में थोड़ी नमी भी है । कुछ उन सपनों के टूट जाने और बिखर जाने की टीस भी रही होगी । जो वहाँ लिखते हुए मेरे शब्दों और वाक्यों में उतर आए हैं । आप इसे इस समय पर एक बयान भी मान सकते हैं । जहाँ कोई मुझे देख नहीं रहा था, अपने समय और काल पर नियमित अंतरालों में कुछ-कुछ दर्ज करता हुआ चलता रहा । हो सकता है, भाषा कहीं-कहीं वास्तविकताओं की तरह जटिल हो गयी हो । इसे मेरे दोष की तरह नहीं देखा जाना चाहिए । इसी छोटी-सी भूमिका के साथ अपने कुछ अग्रजों और साथि…