देखो

बिन कपड़े वाली नंगी लड़कियों को देखो. उनके शरीर पर भी वही खाल है. उसके नीचे नसों में बिलकुल उसी तरह खून बहता है. नीचे उनका रंग लाल है. उनके भी फेफड़े हमारी तरह साँस लेते हुए हवा से भर जाते हैं. एक दिल उनके पास भी है. मूलतः हम एक ही हैं. फ़िर भी हम उन्हें देखने की इच्छाओं से भर गए हैं. इसे ख़ुद से एक सवाल की तरह पूछना चाहता हूँ. क्यों हम उनके स्तनों और नितम्भों को देखना चाहते हैं? उनकी फिसलती सी लगती पीठ पर क्यों फिसलना चाहते हैं. उनकी बिन बाल वाली काँखों में झाँककर दुनिया देखने का सपना हम कहाँ से लेते आये हैं. उनकी नंगी जाँघों पर सिर रखकर लेटे रहने की कामना हम कैसे अपने अन्दर बेल की तरह उगने देते हैं? उनकी महकदार बाँहों पर अपनी खुरदरी उँगलियों से क्या लिख लेना चाहते हैं? शायद हम उपभोक्ता बन गए समय में एक खिड़की के सामने बैठे उन्हें देख रहे हैं. मैंने नहीं देखी हैं, उनके आँखों में भूख. भूख जैसे ही सारी बातों में शामिल होती है. बात बात न रहकर कुछ और बन जाती है. उस दबाव में हम अपने चेहरे बचाने लगते हैं और उन परतों के नीचे कई महत्वपूर्ण सवाल सवाल की तरह बचे रह जाते हैं. मैं इन पंक्तियों को सिलसिलेवार गद्य की तरह भी लिख सकता था. पर नहीं. यह बातें उन पंक्तियों के सिरे नांघ कर कहीं बाहर चली जातीं और बात सिर्फ़ बात बनकर रह जाती. कभी उनमें वह नंगी औरत का चेहरा नहीं उभर पाता. नहीं उभर पाती पसलियों के चटकने की आवाज़.

हम सबकी आँखों में अभी ऐसा नहीं है कि कोई चेहरा नहीं है. वह चेहरा पत्नी का होगा या प्रेमिका का कह नहीं सकता. पर होगा ज़रूर. पर मुझे अपनी बातें ख़त्म करनी हैं. और उन लड़कियों से भी कुछ पूछना है, जो इस विवरण को पढ़कर जुगुप्सा से भर गयी होंगी और अपने अन्दर मेरे लिए पता नहीं किन शब्दों को टटोल रही होंगी, उनसे बस एक छोटा से सवाल पूछना चाहता हूँ, क्या तुमने कभी कोई नंगा लड़का नहीं देखा है?

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