व्यवस्था

अगर हम दोबारा पिछली दोनों पोस्टों को एक साथ एक  के बाद एक  पढ़ जाएँ, तब भी क्या समझ में कोई विस्तार नहीं हुआ होगा? मुझे क्या लगता है कि कहीं कसर न रह जाये, इसलिए एक कोशिश फ़िर से कर लेना ठीक होगा. तो फ़िर से जुट जाते हैं.  देखते हैं, क्या बचा रह गया? मैं बस इतना कह रहा हूँ कि इतिहास के जानकार पूरी दुनिया में हुए अब तक के उन आविष्कारों को खोजें, जब इतिहास नहीं था और इतिहासकार इतिहास के आविष्कार के बाद उसे 'प्राग-इतिहास' कहा करते थे. तब जो खोज हुईं, वह मानव समुदाय की खोज थीं. जैसे आग, पहिया, पत्थर के हथियार, कच्चा माँस खाना, जानवरों की खाल के कपड़े, गुफाओं को रहने के लिए इस्तेमाल करना आदि. यह सूची आगे भी बढ़ सकती है. लेकिन थोड़ा आगे बढ़ते हैं और ज़रा ध्यान से देखिये, जब हम यायावर, घुमंतू, बंजारों की हैसियत से अगले चरण की तरफ़ बढ़ते हैं, तब हमें क्या दिखाई देता है? एक सीमित क्षेत्र है, कुछ प्राकृतिक संसाधन हैं. उनमें ज़मीन से लेकर पशु सब समाहित हैं. इन दोनों की सहायता से हम स्थिर होते हैं. जमीन और बीज के सम्बब्ध को समझते हैं. खेती करना शुरू करते हैं. ख़ुद को अभिव्यक्त करने के लिए हमारे पास एक उन्नत होती भाषा है. इसी स्थायित्व में कहीं विकास करती लेखन शैलियाँ हैं. 

पर मैं जिस चीज़ की तरफ़ ध्यान दिलाना चाहता हूँ, उनमें हैं, इस इतिहास का विकास. धीरे-धीरे यह दावा करने का सबसे कारगर तरीका बनकर उभरने लगता है. कौन-सी उपलब्धियों से उनका भौगोलिक क्षेत्र भरा हुआ है. यह खनिजों से लेकर पशु पक्षियों, मनुष्य की नस्लों और आगे विकास क्रम में उन आविष्कारों पर अपने नियंत्रण की पूर्वपीठिका का लिखा जाना है. यह क्रमशः श्रेष्ठता बोध और उन लोगों के मनस का निर्माता भी बन जाता है. वह इस सीमित क्षेत्रफल वाली पृथ्वी पर ख़ुद को दूसरों पर लादने की इच्छा से भी भर जाएँ, ऐसे प्रमाण भी इसी इतिहास में हमें मिलते हैं. पर चूँकि, यह उनका इतिहास है, इसलिए वह इसमें शोषक और शोषित का सम्बन्ध नहीं देखते. यह विषय, अनुशासन के रूप में, उनके लिए गौरव के विषयों का संधान भी है तथा उसका निर्माता भी.

हो सकता है, इन ऊपर लिखी पंक्तियों में कई सदियों की छलांगे मारता हुआ मैं नवजागरण, औद्योगीकरण, उपनिवेशवाद तक बहुत जल्दी पहुँच गया होऊँगा. इसलिए थोड़ा ठहरने का मन कर गया. पर क्या करें, जब इतिहास विषय के रूप में नहीं एक व्यवस्थापक के रूप में हमें मिलता है, तब नज़रें इनकी तरफ़ चली जाती हैं. यह इतिहास बड़ी बारीकी से लिखा जाता है. जहाँ हम विवाह, जाति, पितृसत्ता, पूँजीवाद जैसी संस्थाओं और व्यवस्थाओं का बनना देखते हैं. यहीं मानने और न मानने का द्वंद्व भी शुरू होता है. इसके साथ-साथ समांनातर, वह दावे भी इतिहास में चलते रहते हैं, जहाँ इन प्रकृति के संसाधनों पर कोई देश विशेष, अपने वैज्ञानिक के ज्ञान विशेष की उपलब्धि पर एकाधिकार जताते हुए, उसकी खोज को सिर्फ़ और सिर्फ़ उसका कहता है. पर व्यक्तिगत रूप से अभी मेरी रूचि समाजशास्त्र और समाज विज्ञान में अधिक हैं. इसलिए वापस लौटते हैं. देखें कहाँ हमारी बात रह गयी. 

तो सखी मेरी, मैं बस इतना ही कहना चाहता हूँ कि जैसे विज्ञान में हुई खोजें किसी व्यक्ति विशेष की निजी उपलब्धि मानकर हम बड़ी सहजता से स्वीकार कर लेते हैं, वैसे ही इन उपरोक्त व्यवस्थाओं को हम किसी एक के संरक्षण में क्यों स्थित नहीं कर पाते? कहाँ है, इन सबकी खोज करने वाला? सवाल दिलचस्प है. यह सवाल अपने आप धीरे-धीरे खुलता हुआ विज्ञान और समाज विज्ञान की प्रकृति को ही नहीं, उन परतों को भी खोल कर बिखेर देगा, जहाँ दोनों अनुशासन अपनी सीमाओं को बनाते हैं. वह कौन हैं(?), जिसके हितों को यह अनुशासन आज तक और भविष्य में पोषित करने वाले हैं. वह कौन हैं, जो इन्हें ऐसा ही बने रहने देना चाहते हैं. कोई बताना चाहेगा, यहाँ हमें जो निजी और सार्वजनिक जैसे साँचों का जो ख़ाका उभरता हुआ दिख रहा है, वह ऐसा ही क्यों है?

इतिहास अपने विकास क्रम में सार्वजानिक से निजी उपलब्धियों की तरफ़ धकेल रहा था, पर ऐसा क्यों हुआ होगा कि समाज विज्ञान में आधुनिक व्यवस्थाएँ किसी एक के नाम नहीं हो पायीं जबकि विज्ञान में इसके उलट आविष्कार किसी व्यक्ति विशेष से ही हमेशा सम्बद्ध रहे? यह कैसे हुआ होगा, हमें समझना होगा. समाज इतना चालक निकला या यह उसकी मंदबुद्धि का परिणाम है? इसका जवाब आपको, मुझे, हम सबको पता है, पर देना कोई नहीं चाहता. 

{ पिछली दोनों पोस्ट: पहली बदलना, दूसरी साँचा. }

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