साँचा

बात फ़िर कल रात से  शुरू करूँगा. कहते हैं, इसे समझना बहुत मुश्किल नहीं है. यह सारा मामला बस समझने और न समझने का है. हम चाहें न चाहें दुनिया इन्हीं दो के बीच बँट चुकी है. एक हैं, जो मानना चाहते हैं. दूसरे हैं जो नहीं मानना चाहते। दोनों अपने से अलग विचार रखने वालों को अपनी तरह करने के लिए आतुर हैं. यह आतुरता आदिम काल से लेकर आज तक वैसी की वैसी हिंसक, बर्बर, अमानवीय बनी हुई है. मानवीय इस दुनिया में कुछ भी नहीं है. सबकुछ इन्हीं तीन के बीच बँट सा गया है. हम ख़ुद  को अगर इन दोनों में कहीं स्थित करने की फ़िराक़ में हैं, तब हम बेवकूफ़ी कर रहे हैं. यह दोनों अवस्थाएं इतनी तरल हैं कि हम इन दोनों के बीच बहते हुए बने रहते हैं. हम अपनी सहूलियतों के अनुसार इस या उस साँचें में ढलते रहते हैं. हम बहुत तेज़ जीव हैं. चालाक। काइयाँ किस्म के. शातिर. चालबाज़. हम गिरगिट की तरह रंग नहीं बदलते, अपने आसपास की जगह को बदलने की फ़िराक में रहते हैं. गिरगिट होते तो क्या बात होती? हम कभी मानते हैं, कभी नहीं मानते हैं. हम इस बात को लेकर भी बहुत सचेत रहते हैं कि कब किस अवस्था में रहने का अधिक लाभ हमें मिल सकता है. यह फ़ायदा सिर्फ़ एक चीज़ से हो रहा था. मानने या न मानने से. हमें और कुछ भी नहीं करना था.

हो सकता है, यह पूरी प्रक्रिया बहुत व्यवस्थित लग रही हो, पर इसकी परतों में बेतरतीब ब्यौरे भरे पड़े हैं, जिनका इतिहास कभी लिखने की कोशिश नहीं हुई. इसी तारीख़ में कभी हमने सबसे पहले पत्थरों से अपने हथियार बनाये. जैसे-जैसे हमें समझ आने लगा पत्थर फैंकने से चोट लगती है, खून बहता है, हम ख़ुद को सभ्य कहलाने की दौड़ में कूद पड़े. एक तरफ़ विज्ञान तरक्की करता रहा, उसी अनुपात में हमारा दिमाग भी रक्त-रंजित दृश्यों से ऊबने का नाटक करने लगा. हमने उसी पल तय किया, अब खून को देखकर जी बहुत उचटता है. उबकाई आती है. कुछ ऐसा करो, जिसमें दुनिया उलझ कर रह जाये. तब उन्होंने हमें हमारे दिमाग में ही उलझाने की तरकीबें सूझने लगीं.

इन ब्यौरों में हजारों सदियों के कई बारीक हिस्से छूटे हुए दिख सकते हैं. ऐतिहासिक कालक्रम में बिखराव सतह पर तैरता हुआ आपके पैरों से टकरा भी सकता है. पर यह तो आपको भी समझना होगा कि हमें जितना अपनी सुरक्षा के लिए विकास के इतिहास में अस्त्र-शस्त्र नहीं बनाये, उससे जादा हमने, अपने बनाये दुश्मनों से निपटने के लिए समय से लेकर मानव श्रम, पूँजी, संसाधनों को इस पूरी प्रक्रिया में झोंक दिया. सदियों से हम बस अपने लिए इन मारक हथियारों को तेज़ करने में लगे रहे. फ़िर एक दौर ऐसा भी आया होगा, जब हमने विचारों को इस क्रम में सबसे धारदार हथियार साबित होते हुए देखा. हमें लगता है, हमने इन्हें ऐसे गढ़ा, जैसे पूरी दुनिया एक झटके से उन्हें मानने लगी होगी. शायद नहीं. और इस तरह हम एक बार फ़िर, उसी मानने, न मानने के फ़ेर में उलझकर रह गए होंगे.

{पिछली रात का हिस्सा: बदलना }

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